रेगिस्तान में झीलें, न्यूक्लियर विंटर: तेल कुओं पर हमले के क्या परिणाम हो सकते हैं? 35 साल पहले हुई थी तबाही.
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कुवैत के तेल कुओं पर हमले का अंजाम: 35 साल पहले मची तबाही, 'न्यूक्लियर विंटर' का डर.
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News18•19-03-2026, 17:26
कुवैत के तेल कुओं पर हमले का अंजाम: 35 साल पहले मची तबाही, 'न्यूक्लियर विंटर' का डर.
•1991 में सद्दाम हुसैन की इराकी सेना ने कुवैत के 605-732 तेल कुओं में आग लगा दी, जिससे दिन में भी रात जैसा अंधेरा छा गया और 'न्यूक्लियर विंटर' का डर पैदा हो गया.
•आग से क्षेत्रीय स्तर पर भारी तबाही हुई, धुएं के गुबार 20,000 फीट तक पहुंचे, काली बारिश हुई और सांस लेने में गंभीर दिक्कतें आईं.
•प्रतिदिन लगभग 4-6 मिलियन बैरल कच्चा तेल जल रहा था, जिससे अनुमानित $157.5 बिलियन का नुकसान हुआ और 40 मिलियन टन रेत को प्रदूषित करने वाली 300 'तेल झीलें' बनीं.
•'ऑपरेशन डेजर्ट हेल' में अंतरराष्ट्रीय टीमों और हंगरी की बिग विंड मशीन जैसे नवीन तरीकों का इस्तेमाल किया गया, जिससे 6 नवंबर, 1991 तक आग बुझा दी गई.
•कुवैत की आग आज भी याद दिलाती है कि युद्ध का प्रभाव सीमाओं से परे पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों के संसाधनों को भी जला देता है.