In India’s digital-first, always-online economy, the question is no longer whether burnout exists, but whether legislation can realistically address it—especially in advertising.  (Image Source: Unsplash)
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Storyboard12-01-2026, 08:04

विज्ञापन उद्योग में बर्नआउट संकट: क्या 'राइट टू डिस्कनेक्ट' बिल समाधान दे पाएगा?

  • एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले द्वारा दिसंबर 2025 में फिर से पेश किया गया 'राइट टू डिस्कनेक्ट' बिल, कर्मचारियों को आधिकारिक घंटों के बाहर काम से संबंधित संचार से अलग होने का कानूनी अधिकार देना चाहता है.
  • हरीश वेंकटेश जैसे विज्ञापन उद्योग के पेशेवर, स्थापित एजेंसियों में भी लंबे समय तक काम करने, बर्नआउट और वेतन में देरी के साथ एक जहरीले काम के माहौल को उजागर करते हैं.
  • निहिलेंट लिमिटेड के केवी श्रीधर को संदेह है कि यह बिल विज्ञापन को कितना बदल पाएगा, उनका तर्क है कि रचनात्मक कार्य जिम्मेदारी-संचालित है और निश्चित घंटों का पालन नहीं करता है, साथ ही घटते रिटेनर और संचार की बढ़ती गति का हवाला देते हैं.
  • बैंगइनदमिडिल के प्रताप सुथन का मानना है कि यह बिल ग्राहक-एजेंसी गतिशीलता को चुनौती देने, बेहतर योजना बनाने और प्रतिभा प्रतिधारण में सुधार के लिए एक आवश्यक व्यवधान है.
  • लिंटास लाइव के कृष्णा अय्यर बताते हैं कि भारत में बर्नआउट दर अधिक है (58-62%), खासकर रचनात्मक उद्योगों में, और यह बिल 'ऑलवेज-ऑन' संस्कृति के खिलाफ आवश्यक सुरक्षा प्रदान कर सकता है.

यह क्यों महत्वपूर्ण है?: 'राइट टू डिस्कनेक्ट' बिल विज्ञापन में व्यापक बर्नआउट से निपटने का प्रयास करता है, लेकिन रचनात्मक भूमिकाओं में इसकी प्रभावशीलता पर बहस जारी है.

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