तलाक-ए-हसन: सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, क्या सभ्य समाज में इसकी जगह?

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News18•12-02-2026, 14:38
तलाक-ए-हसन: सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, क्या सभ्य समाज में इसकी जगह?
- •तलाक-ए-हसन, मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत एक पारंपरिक इस्लामी तलाक पद्धति है, जिसकी संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा रही है.
- •यह तुरंत तीन तलाक से अलग है; इसमें तीन महीने की अवधि में तीन बार 'तलाक' का उच्चारण होता है, जिससे सुलह का अवसर मिलता है.
- •सुप्रीम कोर्ट ने इसकी एकतरफा प्रकृति पर सवाल उठाया है और इसे 'सभ्य समाज के लिए अनुपयुक्त' बताया है, हालांकि यह अभी भी कानूनी रूप से वैध है.
- •मुस्लिम महिलाओं द्वारा दायर याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि यह प्रथा मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 15, 21) का उल्लंघन करती है क्योंकि यह पुरुष-प्रधान है.
- •सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजने का संकेत दिया है और कुछ मामलों में मध्यस्थता का आदेश दिया है, साथ ही तलाक के उच्चारण पर रोक लगाई है.
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