'कबीर नहीं बन पाया': समाज का दर्पण और आधुनिक मनुष्य के संघर्षों का प्रतिबिंब.

साहित्य संसार
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News18•25-12-2025, 17:14
'कबीर नहीं बन पाया': समाज का दर्पण और आधुनिक मनुष्य के संघर्षों का प्रतिबिंब.
- •भोलानाथ कुशवाहा का काव्य संग्रह 'कबीर नहीं बन पाया' समकालीन समाज और व्यक्तिगत संघर्षों का ईमानदार चित्रण है.
- •'इतिहास को खोजें' जैसी कविताएँ विभाजनकारी आख्यानों को चुनौती देती हैं, प्रतिशोध के बजाय अतीत से सीखने का आग्रह करती हैं.
- •'उजाले की कालाबाजारी' और 'दूध और पानी का लोकतंत्र' व्यावसायीकरण और लोकतांत्रिक असमानताओं को उजागर करती हैं.
- •'सच' और 'आदमी भी नहीं बन पाया' कविताएँ लैंगिक गतिशीलता और आधुनिक मनुष्य की नैतिक विफलताओं का आलोचनात्मक परीक्षण करती हैं.
- •शीर्षक कविता 'कबीर नहीं बन पाया' एक गहन आत्म-स्वीकृति है, जो आज की दुनिया में सच्ची नैतिक अखंडता प्राप्त करने की कठिनाई को स्वीकार करती है.
यह क्यों महत्वपूर्ण है?: कुशवाहा का संग्रह आधुनिक समाज और मानवीय पाखंड की एक शक्तिशाली, ईमानदार आलोचना है.
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