उत्तराखंड के तांबे के ढोल-दमाऊ: प्राचीन कला, गूंजती ध्वनि, अटूट विरासत.

बागेश्वर
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News18•30-12-2025, 18:59
उत्तराखंड के तांबे के ढोल-दमाऊ: प्राचीन कला, गूंजती ध्वनि, अटूट विरासत.
- •उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान ढोल-दमाऊ, विशेष रूप से तांबे के बने, बागेश्वर के खरेही में तैयार होते हैं और अपनी गूंजती ध्वनि के लिए प्रसिद्ध हैं.
- •कारीगर अशोक कुमार बताते हैं कि शुद्ध तांबे की चादर को 'तपाई' प्रक्रिया से बार-बार गर्म कर और पीटकर आकार दिया जाता है, जिसमें कई दिन लगते हैं.
- •तांबा अपनी बेहतर ध्वनि के लिए चुना जाता है, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी आवाज दूर तक जाती है, जो पारंपरिक समारोहों और अनुष्ठानों के लिए महत्वपूर्ण है.
- •ये वाद्य यंत्र आस्था का अभिन्न अंग हैं, माना जाता है कि इनकी थाप से देवी-देवताओं का आह्वान होता है, और जागर, विवाह आदि में ये अनिवार्य हैं.
- •आधुनिक चुनौतियों के बावजूद, खरेही के कारीगर इस कला को जीवित रखे हुए हैं, और इसे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की क्षमता है.
यह क्यों महत्वपूर्ण है?: खरेही के तांबे के ढोल-दमाऊ पारंपरिक शिल्प, आध्यात्मिक महत्व और शक्तिशाली ध्वनि का अनूठा संगम हैं, जो चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.
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