भारत को अमेरिका के विफल 'वोक' मॉडल को अस्वीकार करना चाहिए: धर्म के बिना समानता अन्याय है

ओपिनियन
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News18•27-01-2026, 20:47
भारत को अमेरिका के विफल 'वोक' मॉडल को अस्वीकार करना चाहिए: धर्म के बिना समानता अन्याय है
- •लेख में तर्क दिया गया है कि भारत अमेरिकी अकादमिक जगत से एक 'वोक' समानता ढाँचा अपना रहा है, जो पश्चिम में पहले ही विफल हो चुका है.
- •यह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के प्रस्तावित 'समानता' ढाँचे की आलोचना करता है, यह सुझाव देते हुए कि यह पहले से ही दोषी ठहराता है और आरोपी पर सबूत का बोझ डालता है, जिससे संस्थागत अन्याय होता है.
- •लेखक का तर्क है कि यह ढाँचा परिसरों में जातिगत विभाजन को बढ़ाएगा, अविश्वास और भय को बढ़ावा देगा, बजाय एकता को बढ़ावा देने के.
- •जातिगत गतिशीलता की जटिलता को दर्शाने के लिए ऐतिहासिक उदाहरणों और अनुभवजन्य डेटा का हवाला दिया गया है, जो सरल उत्पीड़क-उत्पीड़ित द्विआधारी को चुनौती देता है.
- •यह लेख आयातित 'वोक' विचारधाराओं पर एकता और धर्म पर जोर देते हुए सनातन परंपराओं और वीर सावरकर के जाति उन्मूलन मॉडल पर लौटने की वकालत करता है.
यह क्यों महत्वपूर्ण है?: भारत को अमेरिका के विफल 'वोक' समानता मॉडल को अस्वीकार करना चाहिए, क्योंकि यह परिसरों में अन्याय और विभाजन को बढ़ावा देता है.
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