इसी गांव में रहने वाली सुनीता टुडू बताती हैं कि वो पिछले कई सालों से सखुआ के पत्तों से पत्तल बनाने का काम करती आ रही हैं. सुनीता बताती हैं कि इसकी शुरुआत होती है बेहतर पत्तियों को लाने से. इसके लिए वो हर रोज जंगल जाती हैं. जंगल से सखुआ के पत्ते चुनना आसान काम नहीं होता.
जमुई
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News1804-02-2026, 15:57

जमुई के बिंझी गांव में पत्तल से आजीविका: आदिवासी परिवार जंगल पर निर्भर

  • जमुई के बिंझी गांव में आदिवासी परिवार मुख्य रूप से पत्तल बनाने के व्यवसाय से अपनी आजीविका चलाते हैं.
  • सुनीता टुडू बताती हैं कि साल के पत्ते इकट्ठा करने के लिए उन्हें हर दिन जंगल जाना पड़ता है, जहां कांटे, पथरीले रास्ते और जंगली जानवरों का डर रहता है.
  • पत्ते लाने के बाद उन्हें व्यवस्थित करके पत्तल का आकार दिया जाता है, फिर उन्हें बाजार में बेचा जाता है.
  • शीतल सोरेन के अनुसार, पत्तल बेचने में काफी संघर्ष करना पड़ता है, अक्सर उन्हें बटिया बाजार में बहुत कम कीमत (एक से दो रुपये प्रति पत्तल) पर बेचना पड़ता है, जो 10 किमी दूर है.
  • थर्मोकोल और मशीन से बने प्लेटों के बढ़ते उपयोग के कारण पारंपरिक पत्तल की मांग कम हो गई है, जिससे ग्रामीणों की आय प्रभावित हुई है.

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