शबे-बरात पर 'कूंडे' की रस्म: जायज या बिदअत? मौलाना ने बताया इस्लामी नजरिया

अलीगढ़
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News18•21-01-2026, 13:23
शबे-बरात पर 'कूंडे' की रस्म: जायज या बिदअत? मौलाना ने बताया इस्लामी नजरिया
- •मौलाना इफराहिम हुसैन ने शबे-बरात पर 'कूंडे' की रस्म के इस्लामी दर्जे को स्पष्ट किया, कहा इसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है.
- •शबे-बरात इस्लामी कैलेंडर के अनुसार शाबान की 15वीं रात होती है, जो इबादत, तौबा और मगफिरत की रात मानी जाती है.
- •'कूंडे' की परंपरा में मिट्टी के बर्तनों में खाना बांटना शामिल है, जो यूपी और बिहार के कुछ हिस्सों में प्रचलित है, लेकिन यह एक स्थानीय रिवाज है, इस्लामी प्रथा नहीं.
- •कुरान, हदीस या शुरुआती इस्लामी हस्तियों के जीवन में 'कूंडे' का कोई जिक्र नहीं है, जिससे यह एक बिदअत (नवाचार) है.
- •इस्लाम में बिदअत को गुमराही माना गया है; सवाब पहुंचाने के लिए दान और नेक काम अल्लाह की खुशी के लिए, बिना किसी खास रस्म या दिन के किए जाने चाहिए.
यह क्यों महत्वपूर्ण है?: शबे-बरात पर 'कूंडे' की रस्म एक स्थानीय परंपरा है, इस्लामी प्रथा नहीं, और इसे बिदअत (नवाचार) माना जाता है.
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