बलिया की 'डाल': विवाह का सबसे खास अंग, बांस की महक में समाई परंपरा; इसके बिना शादी अधूरी मानी जाती है.
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बलिया की 'डाल' के बिना अधूरी शादी: बांस की खुशबू में बसती परंपरा, असली वीवीआईपी.
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News18•22-02-2026, 14:29
बलिया की 'डाल' के बिना अधूरी शादी: बांस की खुशबू में बसती परंपरा, असली वीवीआईपी.
•आधुनिक विकल्पों के बावजूद, बलिया की पारंपरिक बांस की 'डाल' शादियों में संस्कृति और विरासत का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बनी हुई है.
•हनुमानगंज के कारीगर सदियों से 'डाल', 'मौर' और 'दौरा' बनाते आ रहे हैं, जिनके बिना शादियां अधूरी मानी जाती हैं.
•'डाल' 'गुरहत्थी' जैसे अनुष्ठानों के लिए महत्वपूर्ण है, जहाँ दुल्हन को गहने भेंट किए जाते हैं, और ऐतिहासिक रूप से इसके बिना मेहमानों को कुछ नहीं परोसा जाता था.
•कारीगर अपनी बारीक कारीगरी के लिए चढ़ावे के माध्यम से न केवल पैसे (300-600 रुपये) बल्कि गेहूं, चावल और आटा जैसे सामान भी कमाते हैं.
•'मौर' 'इमली घोटावन' अनुष्ठान के लिए आवश्यक है, जो इन बांस शिल्पों के गहरे महत्व को उजागर करता है.